(तर्ज – फूल तुम्हें भेजा है खत में)
श्रद्धा सुमन समर्पित करने, आज आये हैं हजारों जन।
चौथे दादा चन्द्र सूर्येश्वर, मेरा भी लेना वन्दन।। श्रद्धा।।
श्रीनाथनाथ हो कुल दीपक, ध्रिया देवी के नन्दन।
तेरह वर्ष का बालक जब में, तोड़े तुमने सब बंधन।।
मानुष जन्म से दीक्षा पाकर, जिन शासन के बने मण्डन।
बिलास में स्वर्ण सिंहासन, भक्त जनों के जीवन का धन।। १।।
अकबर को प्रभावित किया था, धर्म अहिंसा का भगवान।
बंधु गुरु के पद से अलंकृत किया था तुमको गुणवान।।
आज महान महोत्सव जीवन धन, संघ सकल मिल कर वन्दन।
अर्च “विचक्षण” वचन चरण में, मुझे भी देना सत दर्शन।। २।।

