(तर्ज – गीत प्रभाती तेलताला)
मणि मस्तक पर दीप जिनके, बढ़े हुए जयकारी जी। टेरा।
श्री जिनचन्द्र सूरी मणियाले, गुणगान नरनारी जी।।
औरण को तो और भरोसा, मुझको शरण तुम्हारी जी।। १।।
कमलासन अरु पुष्प मनीषा, अक्षत उज्जवल कारी जी।
धूप दीप नैवेद्य आरती, पूजो फल वितारी जी।।
अनुपम मैं गुण समुद्र तुम, कैसे करूं विचारी जी।। २।।
शशिमंडल झिलमिल जल के भीतर, बाल ग्रह कर धारी जी।।
नाम प्रताप हम उरक कोंगि, कृपा आपकी भारी जी।।
श्री जिनचन्द्र हृदय में, आये शरण तुम्हारी जी।। ३।।

